MP Board Class 9th Hindi Vasanti Solutions Chapter 1 साखियाँ वासंती

Madhya Pradesh Board Class 9 Hindi Vasanti Solutions Chapter 1 साखियाँ

By StudyEducation


वासंती कक्षा 9 पाठ 1 साखियाँ प्रश्न उत्तर हिंदी



साखियाँ अभ्यास-प्रश्न

साखियाँ लघु-उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
साधु का स्वभाव किसके समान होना चाहिए और क्यों?
उत्तर
साधु का स्वभाव सूप के समान होना चाहिए, क्योंकि वह तत्त्व की बातों को ग्रहण करता है और व्यर्थ की बातों को छोड़ देता है।

प्रश्न 2.
मनुष्य की तुलना किस-किस से की गई है?
उत्तर
मनुष्य की तुलना काल के चबैना, पानी के बुलबुले, भोर के तारे, अनमोल हीरे और कच्चे घड़े से की गई है।

प्रश्न 3.
नदी और वृक्ष से क्या शिक्षा मिलती है?
उत्तर
नदी और वृक्ष से परमार्थी होने की शिक्षा मिलती है।

प्रश्न 4.
आज का काम कल के लिए क्यों नहीं छोड़ना चाहिए?
उत्तर
आज का काम कल पर इसलिए नहीं छोड़ना चाहिए कि न जाने कल फिर समय मिले न मिले।

प्रश्न 5.
काँच के घड़े की तुलना शरीर से क्यों की गई है?
उत्तर
काँच के घड़े की तुलना शरीर से इसलिए की गई है कि दोनों ही नश्वर हैं। दोनों का अनिश्चित जीवन है।

साखियाँ दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
समय का महत्त्व न समझने के क्या दुष्परिणाम होते हैं?
उत्तर
समय का महत्त्व न समझने के दुष्परिणाम ये होते हैं कि हीरे के समान अमूल्य जीवन व्यर्थ में ही बीत जाता है। फलस्वरूप अच्छे कर्म न करने से अंत में बहुत पछताना पड़ता है। लेकिन इस प्रकार पश्चाताप करने से कुछ भी हाथ में नहीं आता है।

प्रश्न 2.
कुम्हार और मिट्टी के माध्यम से कवि क्या कहना चाहता है?
उत्तर
कुम्हार और मिट्टी के माध्यम से कवि यह कहना चाहता है कि जीवन नश्वर है। उसकी नश्वरता अनिश्चित होने के साथ ही अवश्यसंभावी है। इसलिए हमें अपनी शक्ति-बल का घमंड नहीं करके ईश्वर की शक्ति को याद करके उसके प्रति ध्यान लगाना चाहिए।

प्रश्न 3.
मनुष्य को कब पछताना पड़ता है?
उत्तर
मनुष्य को समय का सदुपयोग करना चाहिए। समय के अनुसार कार्य करने से किसी प्रकार का न तो दुख उठाना पड़ता है और पश्चाताप ही करना पड़ता है। इसके विपरीत समय का दुरुपयोग करने से बहुत बड़ी हानि उठानी पड़ती है। उस समय बहुत पछताना पड़ता है।

प्रश्न 4.
‘हीरा जनम अमोल वा कौड़ी बदले जाय’ इस पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
‘हीरा जनम अमोल था, कौड़ी बदले जाय।
उपर्युक्त पंक्ति का आशय यह है कि मनुष्य का जन्म हीरा की तरह अनमोल होता है। उसको सार्थक न बनाकर उसे यों ही रात-दिन सोकर और खा-पीकर बीता देने से उसकी सार्थकता समाप्त हो जाती है। फलस्वरूप वह कौड़ी के समान मूल्यहीन रह जाता है।

प्रश्न 5.
नीचे दी गई पंक्तियों की संदर्भ सहित व्याख्या लिखिएक.
(क) वृक्ष कबहूँ नहिं फल भखें, नदी न संचै नीर।
परमारथ के कारने, साधुन धरा शरीर ॥
(ख) यह तन काँचा कुम्भ है, लिये फिरै था साथ।
टपका लागा फूटिया, कछु नहिं आया हाथ।।
उत्तर
(क) कबीरदास का कहना है कि जिस प्रकार वृक्ष अपने फल को स्वयं न खाकर दूसरों को ही खाने के लिए प्रदान करता है। नदी अपने जल का संग्रह करके अपने पास नहीं रखती है, अपितु उसे दूसरों को पीने के लिए प्रदान करती है। ठीक इसी प्रकार से सज्जन अपने लिए ही जीवित नहीं रहते हैं, अपित ये दूसरों की भलाई के लिए ही जीवित रहते हैं।

(ख) कबीरदास का कहना है कि यह शरीर कच्चे घड़े के समान है, जिसे अपनी अज्ञानता के कारण मनुष्य उस पर इतराते हुए इधर-उधर घूमता-फिरता है। उस पर जब मृत्यु (काल) का ठोकर लगता है, तब वह फूट (समाप्त हो जाता है। फलस्वरूप कुछ भी हाथ नहीं आता है, अर्थात् सारा जीवन व्यर्थ हो जाता है।

साखियाँ भाषा अध्ययन/काव्य सौंदर्य

प्रश्न 1.
साघु ऐसा चाहिए जैसा………….उड़ाय। कबीर की इन पंक्तियों में अनुप्रास अलंकार का प्रयोग कहाँ हुआ है? छाँटकर लिखिए।
उत्तर
‘सूप सुभाय’ और ‘सार सार’ में अनुप्रास अलंकार है।

प्रश्न 2.
प्रस्तुत पाठ में सुभाय, परमारव, मानुष, परभात जैसे अनेक तद्भव शब्दों का प्रयोग हुआ है पाठ में से पाँच तद्भव शब्द छॉटिए?
उत्तर
पाँच तद्भव शब्द-भूखा, साधुन, दिविस, जनम और औसर।

प्रश्न 3.
पाठ में सुख-दुख, रात-दिन, आज-कल जैसे विलोम शब्दों का प्रयोग किया गया है। इसी तरह के अन्य विलोम शब्दों को लिखिए?
उत्तर
विलोम शब्द-सार-थोथा, हीरा-कौड़ी, मिट्टी-कुम्हार।

साखियाँ योग्यता-विस्तार

प्रश्न 1. कबीर की भक्ति एवं नीति से संबंधित दोहों को संकलित कीजिए तथा अपनी कक्षा में अंत्याक्षरी का आयोजन करें।
प्रश्न 2. भक्तिकाल के कवियों की सूची संकलित करें।
प्रश्न 3. कबीर की वेशभूषा के अनुरूप कबीर का चित्र बनाएँ।
प्रश्न 4. कबीर के चित्र भी हूँढ़े जा सकते हैं।
उत्तर
उपर्युक्त प्रश्नों को छात्र/छात्रा अपने अध्यापक/अध्यापिका की सहायता से हल करें।

साखियाँ परीक्षापयोगी अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्न

लघुउत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
साधू किसका भूखा नहीं होता है और क्यों?
उत्तर
साधू धन का भूखा नहीं होता है। वह तो भाव का भूखा होता है। यह इसलिए कि उसे सांसारिक सुख-सुविधा से विराग होता है।

प्रश्न 2.
परमार्थी किसे कहा गया है?
उत्तर
परमार्थी वृक्ष, नदी और साधु को कहा गया है।

प्रश्न 3.
मनुष्य क्या समझकर (मानकर) फूले नहीं समाता है?
उत्तर
मनुष्य झूठे सुख को सच्चा सुख समझकर (मानकर) फूले नहीं समाता है।

प्रश्न 4.
मनुष्य के क्षणभंगुर जीवन को किसके समान बतलाया गया है?
उत्तर
मनुष्य के क्षणभंगुर जीवन को पानी के बुलबुले और भोर के तारे के समान बतलाया गया है।

प्रश्न 5.
पश्चाताप करने से बचने के लिए क्या करना चाहिए?
उत्तर
पश्चाताप करने से बचने के लिए समय का सदुपयोग करना चाहिए।

साखियाँ दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
साधु के स्वभाव की तुलना सूप के साथ क्यों की गई है?
उत्तर
सूप थोथी (बेकार की) वस्तुओं को उड़ा देता है और सार (तत्त्व) की वस्तुओं को अपने पास रख लेता है। ठीक इसी प्रकार सच्चे साधु का भी स्वभाव होता है। वह भी व्यर्थ की बातों को छोड़ देता और अच्छी बातों को ग्रहण कर लेता है। इस प्रकार साधु का स्वभाव सूप से बिल्कुल मिलता-जुलता है। इसलिए साधु के स्वभाव की तुलना सूप के साथ की गई है।

प्रश्न 2.
‘आज-काल के करत ही, औसर जासी चाल’ का क्या आशय है?
उत्तर
‘आज-काल के करत ही, औसर जासी चाल’ का आशय है-समय का टालमटोल करना। दूसरे शब्दों में यह, मनुष्य जब आज का काम कल पर और कल का काम अगले कल पर छोड़ने लगता है, तो समय उसका इंतजार नहीं करता है। वह तो अपनी ही रफ्तार से आगे बढ़ता जाता है। इस प्रकार समय का सदुपयोग न करने के कारण मनुष्य को बार-बार पछताना पड़ता है। इसलिए आज का काम कल पर और कल का काम अगले कल पर नहीं छोड़ना चाहिए।

प्रश्न 3.
‘इक दिन अइसा होइगा, मैं सैंदूंगी तोहि’ कहकर माटी ने कुम्हार को क्या चेतावनी दी है?
उत्तर
‘इक दिन अइसा होइगा, मैं रूँदूँगी तोहि’ कहकर माटी ने कुम्हार को यह चेतावनी दी है कि समय हमेशा एक समान नहीं रहता है। इसलिए किसी को अपनी ताकत पर नहीं इतराना चाहिए। अपनी ताकत के सामने किसी को कमजोर नहीं समझना चाहिए। समय के बदलते हुए कमजोर-से-कमजोर भी शक्तिशाली को शक्तिविहीन कर देते हैं।

प्रश्न 4.
शरीर को कच्चा घड़ा क्यों कहा गया है?
उत्तर
शरीर को कच्चा घड़ा कहा गया है। यह इसलिए कि दोनों ही लगभग एक समान होते हैं। कच्चा घड़ा कब फूट जाए, कोई ठीक नहीं। इसी प्रकार यह शरीर कब समाप्त हो जाए, कुछ कहा नहीं जा सकता है। इस प्रकार दोनों ही नश्वर हैं। उनकी नश्वरता अनिश्चित है।

प्रश्न 5.
कबीरदास विरचित साखियों का प्रतिपाय अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर
महात्मा कबीरदास द्वारा विरचित ‘साखियाँ न केवल शिक्षाप्रद हैं, अपितु यथार्थपूर्ण भी हैं। कबीर ने इन साखियों में साधु-संतों अर्थात् सज्जनों के स्वभाव, उनके द्वारा किए जाने वाले परोपकार के साथ-साथ मनुष्य के क्षणभंगुर जीवन का चित्रण किया है। मनुष्य को अपने क्षणिक जीवन से सावधान होकर सद्कर्म करने की प्रेरणा इन साखियों में दी गई है। इस प्रकार इन साखियों में यह भी सीख दी गई है कि मनुष्य को सत्कर्म करना चाहिए, दुष्कर्म नहीं। समय का सदुपयोग करते हुए उसे किसी प्रकार काट नहीं करना चादिशा।

साखियाँ कवि-परिचय

प्रश्न
कबीरदास का संक्षिप्त जीवन-परिचय देते हुए उनका साहित्य में स्थान बतलाइए।
उत्तर
निरक्षर संत कवियों में कबीरदास का नाम सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है। ज्ञान के द्वारा ईश्वर-प्राप्ति का मार्ग बतलाने में कबीरदास अत्यधिक लोकप्रिय हैं। जीवन-परिचय-महात्मा कबीरदास का जन्म संवत् 1455 ई. में वाराणसी की एक विधवा ब्राह्मणी के गर्भ से हुआ था जिसने नवजात शिशु को लोक-लाज के कारण लहरतारा नामक तालाब के किनारे रख दिया। नीरु नामक जुलाहा इस बालक को उठाकर अपने घर लाया। इस बालक का लालन-पालन नीरु-नीमा दम्पत्ति ने किया। कबीरदास का विवाह लोई से हुआ था जिससे कमल और कमाली नामक पुत्र और पुत्री उत्पन्न हुए। कबीरदास को कहीं से कोई शिक्षा नहीं मिली थी। इन्होंने स्वयं कहा था’मसि कागद छूयो नहि, कलम गह्यो नहीं हाथ।’

कबीरदास उस समय के महान् धर्मोपदेशक स्वामी रामानन्द के विचारों से अधिक प्रभावित होकर उन्हें अपना गुरु मानकर उपदेश देने लगे। कुछ लोग इनके गुरु ‘शेख तकी’ को एक मुसलमान संत मानते हैं। जीवन के अंतिम दिनों में ये काशी छोड़कर मगहर चले गए और वहीं इनकी मृत्यु संवत् 1575 में हो गई।

कृतियाँ – कबीरदास ने स्वयं ग्रंथ नहीं लिखा बल्कि उन्होंने मौखिक रूप से जो कुछ भी व्यक्त किया, वे ही उनके शिष्यों के द्वारा ग्रंथ के रूप में तैयार किया गया। कबीर की वाणी का संग्रह बीजक के रूप में प्रकाशित हो चुका है। इसे अलग-अलग रूपों में ‘साखी’, ‘शबद’ और ‘रमैनी’ के रूप में जाना जाता है।

भाषा-शैली – कबीरदास की भाषा में खड़ी बोली, हिन्दी भाषा के साथ, अवधी, पूर्वी (बिहारी), पंजाबी, उर्दू आदि भाषाओं के साथ-साथ देशज शब्दों का भी प्रयोग कुशलतापूर्वक हुआ है। इनकी भाषा को इसी कारण खिचड़ी-मिश्रित भाषा कहा जाता है। कुछ लोगों का यह मानना ठीक भी है कि कबीरदास की भाषा सधुक्कड़ी भाषा है।

साहित्य में स्थान – कबीरदास का हिन्दी भक्ति काव्यधारा के ज्ञानमार्गी काव्यधारा में निश्चयपूर्वक सर्वोपरि स्थान है। हिन्दू-मुस्लिम एकता की विचारधारा के मूल प्रवर्तक कबीरदास ही थे। इन्होंने अपनी विचारधारा के अनुसार ही अपना पंथ चलाया। आपकी रचनाओं का प्रभाव आज भी समाज पर अत्यधिक है, जो राष्ट्रीय स्तर पर प्रेरणा और उत्साह जगाकर आत्म-चिंतन को बढ़ाता है।


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